कवर्धा/कबीरधाम। कबीर की धरती कवर्धा में इन दिनों एक ही नाम बार-बार सुनाई दे रहा है, मोहम्मद अकबर। मोहल्लों, चौपालों और बाजारों में लोग कह रहे हैं, “अकबर का राज ठीक था, तब जनता की सुनवाई होती थी, अब तो सुनने वाला कोई नहीं है।” जनता का यह मनोभाव न सिर्फ शासन व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि जिले में प्रशासनिक सुस्ती की हकीकत भी उजागर कर रहा है।
अफसर रहना नहीं चाहते, जनता परेशान
कवर्धा जिले की मौजूदा स्थिति यह है कि यहां अफसर और कर्मचारी दोनों ही पोस्टिंग से कतराने लगे हैं। कोई रहना नहीं चाहता, कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता। जनता महीनों से फाइलों में उलझी हुई है, बिजली विभाग से लेकर तहसील कार्यालय तक, हर दफ्तर में कामकाज ठप और सुनवाई गायब है। जो जिला कभी “सक्रिय प्रशासन” के लिए जाना जाता था, अब “सुस्त सिस्टम” का पर्याय बन गया है।
जनता की जुबान पर पुराना नाम – मोहम्मद अकबर
लोगों के मुताबिक, मोहम्मद अकबर के कार्यकाल में फैसले तेज़ होते थे, अधिकारी जवाबदेह रहते थे और जनता की समस्याएं सीधे शीर्ष स्तर तक पहुंचती थीं। गांव-गांव में लोगों को यह भरोसा था कि “कोई है जो सुनता है।” अब वही जनता कह रही है कि संवेदनशील शासन व्यवस्था कहीं खो सी गई है।
क्या शासन बदलने से संवेदना भी बदल जाती है?
कवर्धा की गलियों में आज यह सवाल गूंज रहा है “क्या सत्ता बदलते ही शासन की नीयत और जनता के प्रति संवेदना भी बदल जाती है?” लोग कह रहे हैं कि चुनावी वादे तो बहुत हुए, पर शासन-प्रशासन की आत्मा कहीं खो गई है। जनता का भरोसा अब डगमगाने लगा है।
जनता की चेतावनी
कवर्धा की जनता का यह बयान अब एक संदेश बन गया है “हम राजा नहीं बदलना चाहते, बस राज की नीयत बदलनी चाहिए।”
जब अधिकारी जनता से दूरी बना लें और जनता की आवाज़ अनसुनी रह जाए, तो यह किसी जिले के लिए सबसे बड़ा संकट होता है। कवर्धा को फिर से अपनी पहचान लौटानी होगी — जहां न्याय, संवेदना और जनता की आवाज सबसे ऊपर हो।
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