सागर (मध्य प्रदेश): सागर जिले में पुलिस थानों की कथित अवैध गतिविधियों का स्टिंग करने वाले तीन पत्रकारों को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुरक्षा प्रदान करते हुए उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। यह पहली बार है जब स्टिंग ऑपरेशन के बाद पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर अदालत ने इतना स्पष्ट और सख्त हस्तक्षेप किया है।
सिंगल बेंच के जस्टिस हिमांशु जोशी ने तत्काल राहत देते हुए कहा कि रिपोर्टर्स पर किसी भी तरह का coercive action नहीं लिया जाएगा। न्यायालय ने मुख्य सचिव, डीजीपी और गृह व विधि विभाग के प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने को कहा। साथ ही सीबीआई को भी नोटिस भेजकर जवाब तलब किया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
30 नवंबर 2025 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित स्टिंग रिपोर्ट में सागर जिले के कुछ थाना क्षेत्रों में पुलिस की संदिग्ध गतिविधियों का खुलासा हुआ था। पत्रकारों ने अदालत को बताया कि स्टिंग रिपोर्ट आने के बाद उन्हें झूठे मामलों में फंसाकर गिरफ्तारी की धमकी दी जा सकती है। याचिका में सागर आईजी हिमानी खन्ना, एसपी विकास सहवाल और चार थाना प्रभारियों को व्यक्तिगत रूप से पक्षकार बनाया गया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने रिपोर्ट पढ़ी और मामले की गंभीरता को समझते हुए पत्रकारों को तत्काल सुरक्षा प्रदान की। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि स्टिंग करने वाले रिपोर्टरों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं की जाएगी।
मुख्य आदेश और प्रभाव
पत्रकारों को थानों में किए गए स्टिंग के बाद सुरक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया गया।
वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया, जिसमें मुख्य सचिव, डीजीपी और गृह व विधि विभाग के प्रमुख सचिव शामिल हैं।
अदालत ने अगली सुनवाई 27 जनवरी 2026 तय की है, जब विस्तृत पक्ष रखा जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश केवल सागर जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में खोजी पत्रकारिता की सुरक्षा के लिए मिसाल माना जा रहा है। स्टिंग-आधारित रिपोर्टिंग पर दंडात्मक कार्रवाई रोकने और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आगामी संभावित बदलाव
पुलिस थानों में स्टिंग रिपोर्ट के बाद तुरंत एफआईआर या गिरफ्तारी पर न्यायिक निगरानी बढ़ सकती है।
मीडिया संगठनों और रिपोर्टरों के लिए थानों और संवेदनशील संस्थानों में तथ्य-संग्रह के दौरान सुरक्षा एवं वैधानिक प्रक्रिया पर स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाने की आवश्यकता बढ़ सकती है।
इस फैसले को प्रेस स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सुरक्षा के दृष्टिकोण से ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि यह पहली बार है जब हाईकोर्ट ने स्टिंग रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इतनी स्पष्ट रोक लगाई है।















