Sunday, February 15, 2026

भारत बना विश्व चैंपियन, महिला वनडे वर्ल्ड कप 2025 में दक्षिण अफ्रीका को 52 रन से हराया, कोरबा में आतिशबाजी से गूंजा आसमान

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आज भारतीय इतिहास की नई प्रभात है। वह क्षण, जब करोड़ों हृदयों ने गर्व की धड़कन महसूस की। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय विश्व कप जीतकर यह प्रमाणित कर दिया — सपनों का कोई लिंग नहीं होता, केवल समर्पण और साहस होता है।
यह विजय केवल खेल की नहीं, यह स्त्री-सशक्तिकरण की शाश्वत यात्रा का एक सुनहरा पड़ाव है।

हम अक्सर कहते हैं कि भारत पुरुष प्रधान समाज है — जहाँ निर्णय, अवसर और मंच पुरुषों के ही हिस्से में अधिक आते रहे। किंतु यही भारत है जहाँ शक्ति के रूप में दुर्गा, ज्ञान के रूप में सरस्वती, और समृद्धि के रूप में लक्ष्मी की पूजन होता है। विरोधाभास यही है — पूजने में सहज, पर समानता देने में संकोच।

भारतीय नारी का इतिहास कष्टों की परीक्षा और विजय की कहानी है।
मीरा की भक्ति, रज़िया सुल्ताना की सत्ता, झाँसी की रानी की तलवार, अहिल्याबाई होलकर की शासन-शक्ति, सावित्रीबाई फुले की शिक्षायात्रा, पंडिता रमाबाई का संघर्ष, और मातंगिनी हज़ारा और उदा देवी की बलिदानगाथा — इन सभी ने उस समाज में दमककर अपनी पहचान बनाई, जहाँ समाज उनकी प्रगति से भयभीत था।

कभी पर्दा प्रथा ने रोका, कभी बाल विवाह ने सपने छीन लिए, कभी शिक्षा के दरवाज़े बंद कर दिए, कभी परंपराओं ने पंख बाँध दिए।
लेकिन भारतीय नारी रुकी नहीं — झुकी नहीं।
वह संघर्ष करती रही, और आज भी कर रही है।

वैज्ञानिक बनी — सवित्री बाई फुले ने ज्ञान का दीप जलाया।
राजनीति में आयी — इंदिरा गांधी की दृढ़ता ने दुनिया को चकित किया।
आसमान को छुआ — कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स ने नई दिशा दी।
खेल जगत में चमकी — मीराबाई चानू, साइना, सिंधु, मेरी कॉम ने विश्व पटल पर परचम लहराया।

और अब —
महिला क्रिकेट टीम ने उस मानसिकता को मात दे दी जिसे लगता था —
“क्रिकेट? वह तो पुरुषों का खेल है।”

उनके बल्ले से निकली हर सीमा-पार गेंद समाज की सीमाएँ भी तोड़ती चली गई।
उन्होंने सिद्ध किया:

“स्त्री किसी चीज़ की आकांक्षी नहीं, वह हर चीज़ की अधिकारी है।”

फिर भी, हम यह नहीं भूल सकते — आज भी देश के कोने-कोने में न जाने कितनी बेटियाँ हैं जिन्हें किताब के बदले चौका-चूल्हा थमा दिया जाता है, सपनों के बदले ‘मर्यादा’ के ताले, खेल मैदान के बदले ‘इज्ज़त’ की दीवारें।
आज भी यह वाक्य सुनाई देता है —
“लड़की है, ज़्यादा पढ़-लिखकर करेगी क्या?”

और यही सोच बदलने के लिए यह जीत केवल खेल उपलब्धि नहीं — विचार क्रांति है।

समाज को यह समझना होगा —
स्त्री को सुरक्षा नहीं, स्वतंत्रता चाहिए।
तरस नहीं, सम्मान चाहिए।
दया नहीं, दायित्व चाहिए।
यह स्वीकारना होगा —
बेटी परिवार का केवल मान नहीं, बल्कि देश का भविष्य होती है।

आज भारत की बेटी ने पूरे विश्व से कहा —
“सक्षम हूँ, मैं अजेय हूँ, मैं सीमाएँ नहीं मानती।”
और पूरे भारत ने गर्व से उत्तर दिया —
“तुम केवल खिलाड़ी नहीं, हमारे सपनों की प्रतीक हो।”

अब समाज की बारी है —
सिर्फ ताली बजाने की नहीं,
तालियाँ बनाने की।
बेटियों को रास्ता देने की।
उनका क़द बाँधने की नहीं,
उनकी उड़ान को हवा देने की।

आज का यह क्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरक दीप है।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम को हार्दिक बधाई —
आपने केवल विश्व कप नहीं जीता,
भारत की आत्मा को ऊँचा उठाया है।

जय हिंद 🇮🇳

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