मासूम भव्या जोशी के लिए कैंडल मार्च में कथित अमर्यादित टिप्पणी पर उबाल, वीडियो हटाने और भविष्य में ऐसी भाषा पर रोक लगाने की मांग
कोरबा। Korba Breaking : सात साल की मासूम भट्या जोशी के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे कोरबा को झकझोर दिया। बच्ची को न्याय दिलाने के लिए कैंडल मार्च निकाला गया, लेकिन इसी मार्च के दौरान मृत बच्ची के लिए कथित अमर्यादित शब्दों के इस्तेमाल का मामला अब विवाद का विषय बन गया है। भाजपा महिला मोर्चा की नेत्री कविता सोनी के कथित बयान के खिलाफ जिला अधिवक्ता संघ की महिला उपाध्यक्ष अधिवक्ता उर्मिला भगत ने मोर्चा खोलते हुए पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत सौंपी है। उन्होंने संबंधित वीडियो का विवादित अंश हटाने, सार्वजनिक माफी मांगने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए एडवाइजरी जारी करने की मांग की है।
न्याय की मांग के बीच मृत बच्ची की गरिमा पर सवाल!
शिकायत के मुताबिक, 25 अक्टूबर 2026 को टीपी नगर चौक, कोरबा में आयोजित कैंडल मार्च के दौरान मीडिया कैमरों के सामने मृत बच्ची के निजी अंगों को लेकर कथित तौर पर अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया गया। शिकायतकर्ता अधिवक्ता उर्मिला भगत ने इस भाषा पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे मृत नाबालिग की गरिमा और महिला सम्मान के प्रतिकूल बताया है।
सवाल यह है कि जिस मासूम को न्याय दिलाने के लिए लोग सड़कों पर उतरे, उसके लिए इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों की मर्यादा क्या इतनी भी जरूरी नहीं थी? अपराध के खिलाफ आक्रोश अपनी जगह है, लेकिन उस आक्रोश को व्यक्त करते समय पीड़िता की गरिमा और उसके परिवार की भावनाओं का सम्मान भी उतना ही जरूरी है।
उर्मिला भगत की दो टूक: वीडियो हटे, सार्वजनिक माफी मांगी जाए
जिला अधिवक्ता संघ की महिला उपाध्यक्ष उर्मिला भगत ने पुलिस अधीक्षक को सौंपे गए आवेदन में संबंधित बयान पर आपत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट मांग रखी है कि विवादित वीडियो अंश को हटाया जाए और संबंधित वक्ता सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।
उनका पक्ष है कि ऐसी भाषा पीड़ित परिवार को दोबारा मानसिक आघात पहुंचा सकती है। बाल अपराध जैसे संवेदनशील विषय पर आयोजित विरोध प्रदर्शन में जिम्मेदार और मर्यादित भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। न्याय की मांग करते समय पीड़ित की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता।
शिकायत में POCSO और IPC की धाराओं का हवाला
अधिवक्ता ने अपने आवेदन में पॉक्सो अधिनियम की धारा 23 और भारतीय दंड संहिता की धारा 79 का उल्लेख करते हुए मामले की जांच और नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।
हालांकि, शिकायत में धाराओं का उल्लेख होना अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं है। संबंधित वीडियो, बयान के पूरे संदर्भ और लागू कानूनों की जांच के बाद ही कानूनी जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
पुलिस प्रशासन से तीसरी मांग: भविष्य के लिए एडवाइजरी
उर्मिला भगत ने केवल संबंधित बयान पर आपत्ति जताकर मामला समाप्त नहीं किया, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की मांग भी उठाई है। उन्होंने बाल अपराधों के विरोध में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान भाषा की मर्यादा बनाए रखने के लिए आवश्यक एडवाइजरी जारी करने का आग्रह किया है।
अब पुलिस प्रशासन के सामने शिकायत की जांच और उस पर उचित कार्रवाई का सवाल है। क्या संबंधित वीडियो की पड़ताल होगी? क्या शिकायतकर्ता की मांगों पर कोई कदम उठाया जाएगा? और क्या संबंधित वक्ता अपना पक्ष रखते हुए सार्वजनिक माफी मांगेंगी?
मासूम भव्या जोशी के लिए न्याय की लड़ाई में एक बात स्पष्ट है: अपराध के खिलाफ आवाज बुलंद होनी चाहिए, लेकिन उस आवाज में पीड़िता की गरिमा और परिवार के सम्मान के लिए भी जगह होनी चाहिए।















