करीब 25 साल पहले की बात है, जब मैं सिर्फ़ एक बच्चा था, अपनी ज़िंदगी के सबसे मासूम और सुनहरे दिनों को जी रहा था। गाँव के छोटे से सरकारी स्कूल में, जहाँ हमने पढ़ाई की शुरुआत की, वहाँ की हर याद आज भी दिल में बसी हुई है। और खासकर गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के दिन की वो रोशनी, उत्साह और उमंग आज भी मेरी आँखों में ताज़ा हैं। उन दिनों की यादें इतनी गहरी हैं कि जब भी 26 जनवरी का दिन आता है, मेरा मन फिर से उन्हीं दिनों में खो जाता है, जैसे समय की रेत में पीछे खींचा जा रहा हो।
गाँव बहुत छोटा था, शायद 800 से 900 लोग होंगे उस समय। घर मिट्टी और ईंटों के होते थे, लेकिन दिल सोने से बने होते थे। मेरा स्कूल भी बड़ा नहीं था—बस चार-पाँच कमरे और एक खुला मैदान। लेकिन उस मैदान में वो गर्मजोशी, वो जज़्बा था, जिसे शायद ही कोई महानगरों के स्कूलों के बड़े-बड़े मैदानों में पा सके। जैसे ही जनवरी का महीना आता, पूरे गाँव में 26 जनवरी की तैयारियों की हलचल शुरू हो जाती। स्कूल में हर दिन बच्चों के बीच एक अलग सा जोश दिखता था। और क्यों न हो? ये हमारे लिए सबसे बड़ा त्योहार था—गणतंत्र दिवस!
जैसे ही 26 जनवरी नज़दीक आती, हमारी पढ़ाई का आधा समय गणतंत्र दिवस की तैयारियों में बीतने लगता। सुबह के पहले कुछ घंटे पढ़ाई होती, लेकिन दोपहर होते ही सबकी उत्सुकता बढ़ जाती। फिर कक्षा के बच्चे अपने अपने कार्यक्रम की तैयारी में जुट जाते। कोई कविताओं को याद करता, कोई नाटक की रिहर्सल करता, तो कोई गीत-संगीत में डूब जाता। एक हफ्ते पहले से ही पूरा स्कूल इसी तैयारी में जुट जाता था।
फिर आता था 26 जनवरी का दिन, वो सुबह जैसे पूरे गाँव में उत्सव का सैलाब ले आती थी। मैं भी उन दिनों के इंतजार में रहता था, जब गणतंत्र दिवस की सुबह हम सभी बच्चे अपने-अपने घर से एक नारियल लेकर आते थे। यह हमारी परंपरा थी, जिसे वर्षों से निभाया जा रहा था। स्कूल का प्रांगण नारियल और बूंदी से भर जाता था। गुरुजन, गाँव के वरिष्ठजन और सरपंच भी इस दिन विशेष नारियल और बूंदी लेकर आते थे। जैसे ही गाँव के लोग इस बात की खबर सुनते कि आज गणतंत्र दिवस है, वे भी अपने बच्चों के साथ सुबह से ही स्कूल की तरफ़ चल पड़ते।

सुबह सबसे पहले ध्वजारोहण होता था। गाँव के हर घर से बच्चे तिरंगे के सामने एकत्र होते, और जैसे ही झंडा फहराया जाता, पूरा आसमान “झंडा ऊँचा रहे हमारा” के स्वर से गूंज उठता। ये गीत हमारे बचपन का हिस्सा बन चुका था। फिर हम सभी बच्चे प्रभातफेरी में निकलते। तीन-तीन बच्चों का एक समूह बनता और हाथों में हाथ डालकर, गाँव की हर गली में घूमते। “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा” गाते हुए हम पूरे गाँव की गलियों में तिरंगा लहराते, जैसे हम खुद उस आजादी और गणतंत्र का जश्न मना रहे हों जिसे हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा था।
प्रभातफेरी के बाद हम वापस स्कूल लौटते, जहाँ एक छोटा सा मंच सजा होता था। मंच पर गाँव के बुजुर्ग और हमारे गुरुजन बैठते थे। स्कूल के बच्चे अपने दिल से तैयारी की हुई प्रस्तुतियाँ देते। कोई कविता सुनाता, तो कोई नाटक में भाग लेता। इन सबके बीच, एक चीज़ जो मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती थी, वह था नारियल तोड़ने का जिम्मा। हर साल चार-पाँच बच्चों का एक ग्रुप बनता था, जो आए हुए नारियलों को छीलता और तोड़ता। मुझे याद है, कैसे हम सब मिलकर नारियल को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटते, फिर उसे बूंदी के साथ मिलाकर पूरे स्कूल और गाँव में बाँटते थे।
वो नारियल और बूंदी जैसे हमारी गणतंत्र दिवस की परंपरा का हिस्सा बन गए थे। ऐसा लगता था कि इस दिन अगर हमने नारियल और बूंदी नहीं खाई, तो गणतंत्र दिवस अधूरा सा रह जाएगा। बचपन की वो छोटी-छोटी खुशियाँ जैसे हमारी पूरी दुनिया थीं। उस दिन जो विशेष नारियल लाए जाते थे, उनमें से कुछ को गुरुजन संभाल कर अलग रख लेते थे। फिर कुछ दिनों बाद, एक छोटे से कार्यक्रम में केवल स्कूल के बच्चों और शिक्षकों के साथ उन नारियलों को बांटा जाता था।
गाँव का जीवन सीधा-सादा था, और हम बच्चे उसी सादगी में ढल गए थे। आज जब मैं उस दौर की तुलना इस आधुनिक, भागमभाग भरी दुनिया से करता हूँ, तो मन में एक कसक सी होती है। तब हम जिन खुशियों को महसूस करते थे, वे बहुत छोटी-छोटी होती थीं, लेकिन उनमें जो सुकून और संतोष था, वह अनमोल था। आज की दुनिया में, जहाँ हर चीज़ इतनी तेज़ हो चुकी है, जहाँ निजीकरण ने शिक्षा को एक व्यापार बना दिया है, वहाँ वो मासूमियत कहीं खो सी गई है।

मुझे अब भी याद है, कैसे उस दिन के अंत में हम अपने घर लौटते हुए गर्व से भरे होते थे। गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम के बाद हमें यह अहसास होता था कि हम एक ऐसे देश का हिस्सा हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने खून-पसीने से सींचा है। वो दिन सिर्फ़ एक पर्व नहीं था, बल्कि हमारे भारतीय होने का गौरव था, जो हमारे छोटे से गाँव से लेकर पूरे देश में महसूस होता था।
आज जब मैं अपने स्कूल के दिनों को याद करता हूँ, तो आँखों में आँसू आ जाते हैं—गर्व के आँसू। मुझे गर्व है कि मैं उस समय का हिस्सा था, जब हमारी पहचान हमारी सादगी और हमारी परंपराओं में बसी हुई थी। आज चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए, मेरे मन में वो बचपन की मासूम यादें हमेशा जिंदा रहेंगी, और हर 26 जनवरी को, मैं उन सुनहरे दिनों की यादों में खो जाऊँगा।















