6 साल की मासूम से दरिंदगी, हत्या के दोषी सगे चाचा को फांसी; 17 महीने में आया इंसाफ

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छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से सामने आई मासूमियत को झकझोर देने वाली वारदात में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। 6 साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म और उसकी हत्या के दोषी उसके सगे चाचा को विशेष POCSO कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है। करीब डेढ़ साल पहले हुई इस वारदात ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया था। आरोपी ने बच्ची को बहला-फुसलाकर सुनसान जगह पर ले जाकर उसके साथ दरिंदगी की और फिर उसकी हत्या की कोशिश की। बाद में बच्ची को पड़ोसी की कार में छिपा दिया गया।

    पुलिस के मुताबिक, आरोपी वारदात के बाद करीब तीन घंटे तक परिवार और पुलिस के साथ बच्ची को खोजने का नाटक करता रहा। लेकिन उसकी एक हरकत ने पुलिस का शक गहरा दिया और आखिरकार इसी कड़ी से पूरा राज खुल गया।

    मामला दुर्ग के मोहन नगर थाना क्षेत्र का है। तारीख थी 6 अप्रैल 2025। सुबह करीब 8 बजे 6 साल की बच्ची अपनी बुआ-दादी के घर पहुंची थी। घर में कन्या पूजा की तैयारी चल रही थी और परिवार की महिलाएं पूजा-पाठ तथा दूसरे कामों में व्यस्त थीं।

    आरोप है कि इसी दौरान घर में मौजूद 24 वर्षीय चाचा बच्ची को बहला-फुसलाकर मकान की छत पर बने अधूरे कमरे में ले गया। पुलिस जांच के मुताबिक, वहां बच्ची के साथ यौन हिंसा की गई और उसके साथ क्रूरता की गई। इसके बाद आरोपी ने बच्ची को मृत समझ लिया और शव को ठिकाने लगाने की कोशिश शुरू कर दी।

    लेकिन बच्ची की सांसें उस समय चल रही थीं।

    आरोपी ने बच्ची को मोहल्ले में खड़ी पड़ोसी की पुरानी कार में छिपा दिया। बताया जाता है कि उसे कार के खराब दरवाजे की जानकारी थी। इसी का फायदा उठाकर उसने बच्ची को कार में छिपाया, ताकि शक किसी और पर जाए।

    दोपहर बाद जब बच्ची घर नहीं पहुंची तो परिवार ने उसकी तलाश शुरू कर दी। शाम करीब 4 से 5 बजे के बीच परिजन पुलिस के पास पहुंचे। पुलिस ने तत्काल तलाश शुरू की। इलाके के CCTV कैमरे खंगाले गए और कन्या भोज में बच्ची के साथ मौजूद बच्चों से पूछताछ की गई।

    जांच में एक अहम बात सामने आई—बच्ची दादी के घर से दूसरे बच्चों के साथ बाहर निकली ही नहीं थी।

    इधर आरोपी चाचा भी पुलिस के साथ बच्ची की तलाश में शामिल हो गया। वह लोगों के सामने चिंता और हमदर्दी दिखाता रहा। लेकिन तलाश के दौरान वह बार-बार उसी पुरानी कार के पास जाता और उसे खोलकर देखता था, जिसमें बच्ची को छिपाया गया था।

    सिविल ड्रेस में निगरानी कर रहे क्राइम ब्रांच के जवानों की नजर आरोपी की इस हरकत पर पड़ी। पुलिस का शक गहराया और कार की डिक्की/अंदरूनी हिस्से की तलाशी ली गई। वहां बच्ची अचेत हालत में मिली।

    बताया गया कि उस वक्त उसकी सांसें चल रही थीं। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

    मेडिकल जांच में बच्ची के साथ यौन हिंसा और शरीर पर चोटों के निशान सामने आए। पुलिस ने आरोपी चाचा को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की, लेकिन वह लगातार पुलिस को गुमराह करता रहा।

    बाद में कड़ाई से पूछताछ के दौरान उसने अपराध कबूल कर लिया।

    जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी की कार मालिक से पुरानी रंजिश थी। पुलिस के मुताबिक, इसी रंजिश का फायदा उठाकर बच्ची को पड़ोसी की कार में छिपाया गया था, ताकि पुलिस का शक कार मालिक पर जाए।

    वारदात के बाद इलाके में भारी आक्रोश फैल गया। गुस्साई भीड़ ने कार मालिक के घर और कार में तोड़फोड़ की। घर में आग लगाने की घटना भी सामने आई। वहीं मोहन नगर थाने का घेराव हुआ और पुलिस से झड़प तथा थाने में तोड़फोड़ की स्थिति बनी।

    दुर्ग अधिवक्ता संघ ने भी फैसला लिया कि जिले का कोई वकील आरोपी का केस नहीं लड़ेगा। हालांकि न्यायिक प्रक्रिया के तहत आरोपी को कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई।

    इस बेहद गंभीर मामले की जांच के लिए पुलिस ने 10 सदस्यीय SIT गठित की थी। पुलिस ने महज पूछताछ और कबूलनामे पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक सबूतों को केस की मजबूत कड़ी बनाया।

    घटनास्थल और आरोपी के कपड़ों से मिले जैविक नमूनों की DNA जांच कराई गई। जांच में DNA का मिलान हुआ। बच्ची के शरीर पर मिले चोटों और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों को भी जांच का हिस्सा बनाया गया।

    कई स्थानीय गवाह सुनवाई के दौरान अपने बयान से मुकर गए, लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्यों और पुलिस की जांच ने अभियोजन पक्ष का केस मजबूत बनाए रखा।

    पुलिस ने 9 मई 2025 को कोर्ट में चालान पेश किया। 26 मई 2025 को आरोपी पर आरोप तय किए गए और 11 जून 2025 से गवाहों के बयान दर्ज होना शुरू हुए।

    करीब 17 महीने चली कानूनी प्रक्रिया के बाद विशेष POCSO कोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा।

    और फिर आया 10 सितंबर 2026 का दिन।

    अदालत ने 6 साल की मासूम से दुष्कर्म और उसकी हत्या के दोषी उसके सगे चाचा को फांसी की सजा सुनाई।

    अब इस मृत्युदंड पर हाईकोर्ट की पुष्टि की औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया बाकी है।

    दुर्ग की इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं कि मासूम बच्चों की सुरक्षा के लिए परिवार और समाज को कितनी सतर्कता बरतनी होगी। वहीं इस मामले में पुलिस की वैज्ञानिक जांच और DNA जैसे सबूतों की अहम भूमिका रही, जिसने कई गवाहों के मुकरने के बावजूद आरोपी के खिलाफ केस को मजबूती दी।

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