कोरबा। पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट और प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण जैसी केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना में कोरबा जिला के तिलकेजा ग्राम पंचायत में सामने आया मामला अब महज पंचायत स्तर की अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है। जिला स्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट में 48 अपात्र हितग्राहियों के नाम पर आवास स्वीकृत करने, दूसरे परिवारों अथवा व्यक्तियों के खातों में राशि हस्तांतरित करने तथा मृतकों के नाम पर किस्त जारी कर राशि आहरण किए जाने संबंधी आरोप सिद्ध पाए गए हैं। मामले में जिला पंचायत की ओर से उरगा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। मामले में चार संविदाकर्मियों की सेवा समाप्त, सचिव निलंबित व उरगा थाने में एफआईआर दर्ज़ की गई है। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिला पंचायत के स्तर पर जांच के बाद प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े विकासखंड समन्वयक देवानंद श्रीवास, तकनीकी सहायक अभिषेक चौरसिया, डाटा एंट्री ऑपरेटर ध्रुव कुमार साहू और कंप्यूटर ऑपरेटर धनंजय पटेल की संविदा सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। वहीं ग्राम पंचायत तिलकेजा की सचिव नविता दुबे को निलंबित किया गया है। प्रशासनिक कार्रवाई और पुलिस एफआईआर के बाद अब योजना की राशि वास्तव में किन खातों में पहुंची, किस स्तर पर भुगतान स्वीकृत हुआ और राशि का अंतिम उपयोग कहां हुआ—इन सवालों की जांच महत्वपूर्ण हो गई है। जिला पंचायत के रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित पंचायत के सरपंच और सचिव को 48 हितग्राहियों से संबंधित आधार कार्ड, बैंक पासबुक का प्रथम पृष्ठ और मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी रजिस्टर प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था। निर्धारित तिथि पर दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाने के बाद सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। जवाब नहीं देने और जांच में सहयोग नहीं करने को भी प्रशासन ने गंभीरता से लिया। इसके बाद जिला स्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। अब पुलिस जांच में यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि किस हितग्राही के नाम पर कितनी राशि जारी हुई, राशि किस खाते में गई, खाते से किसने रकम निकाली और लाभार्थी के नाम तथा वास्तविक खाताधारक के बीच क्या संबंध था। जिला पंचायत के जिला समन्वयक आशीष कुमार द्वारा प्रस्तुत आवेदन के आधार पर उरगा थाना पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू की है।शिकायत में देवानंद श्रीवास, अभिषेक चौरसिया, ध्रुव कुमार साहू, धनंजय पटेल, आवास मित्र रामेश्वरी कंवर, पंचायत सचिव नविता दुबे सहित अन्य के विरुद्ध कार्रवाई का अनुरोध किया गया था। मामले में पुलिस ने उक्त आरोपियों के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया है। अब पुलिस जांच में दस्तावेजों, बैंक खातों और योजना पोर्टल के रिकॉर्ड का मिलान होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित वित्तीय अनियमितता में कुल कितनी शासकीय राशि प्रभावित हुई और इसकी जिम्मेदारी किस-किस स्तर पर तय होती है।
केंद्रीय योजना में गड़बड़ी, केंद्रीय स्तर की जांच की मांग उठना स्वाभाविक
प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित प्रमुख ग्रामीण आवास कार्यक्रम है। योजना में पात्र परिवारों की पहचान, ग्रामसभा से सत्यापन और विभिन्न स्तरों पर निगरानी की व्यवस्था निर्धारित है। ऐसे में तिलकेजा में अपात्रों और मृतकों के नाम पर आवास स्वीकृति तथा कथित रूप से अन्य खातों में राशि जाने की जांच का दायरा केवल पंचायत और जिला स्तर तक सीमित रखने के बजाय वित्तीय लेनदेन की स्वतंत्र पड़ताल तक ले जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। विशेषज्ञ स्तर पर यह सवाल भी उठ सकता है कि यदि सरकारी जांच में आरोप सिद्ध पाए गए हैं तो पीएमएवाई -जी पोर्टल पर लाभार्थी की एंट्री से लेकर स्वीकृति, फंड ट्रांसफर ऑर्डर, बैंक खाते, आधार संबंधी विवरण और राशि के आहरण तक की पूरी डिजिटल ट्रेल का स्वतंत्र ऑडिट क्यों न कराया जाए। जरूरत पड़ने पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा केंद्रीय स्तर की संबंधित जांच/वित्तीय जांच एजेंसियों से भी परीक्षण कराने पर विचार किया जा सकता है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि गड़बड़ी पंचायत स्तर तक सीमित थी अथवा इसके पीछे कोई व्यापक नेटवर्क था।
प्रधानमंत्री के ‘हाउसिंग फॉर ऑल’ लक्ष्य पर सवाल
पीएमएवाई -जी का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के पात्र परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराना है। केंद्र सरकार ने 2024-25 से 2028-29 तक योजना जारी रखते हुए दो करोड़ अतिरिक्त ग्रामीण आवासों के निर्माण को मंजूरी दी है। ऐसे में तिलकेजा जैसे मामले में यदि जांच में अपात्रों, मृतकों अथवा अन्य व्यक्तियों के खातों में योजना की राशि भेजे जाने की पुष्टि होती है, तो यह केवल स्थानीय प्रशासनिक चूक का मामला नहीं रहेगा, बल्कि योजना की पात्रता जांच, डिजिटल सत्यापन और वित्तीय निगरानी की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—48 नामों की सूची कैसे तैयार हुई, सत्यापन किस स्तर पर हुआ, भुगतान की अनुमति किसने दी और सरकारी राशि आखिर किन हाथों तक पहुंची? इन सवालों के जवाब पुलिस जांच के साथ-साथ स्वतंत्र वित्तीय जांच से ही पूरी तरह सामने आ सकेंगे।
होशियारी पड़ी महंगी
कहते हैं किसी के लिए गड्ढा खोदो तो आदमी खुद उसमें गिर जाता है। इस पूरे भ्रष्टाचार के मामले में यह कहावत सटीक बैठ रही है। सूत्रों की मानें तो तकनीकी सहायक अभिषेक चौरसिया ने किसी अन्य का कच्चा चिट्ठा खोलने व्हाट्सएप पर मैसेज किया था, लेकिन उसे क्या पता था कि वह मैसेज उसके काले कारनामों की भी पोल कर रख देगा। अब कार्रवाई के बाद चर्चा है कि अभिषेक को उसकी ही होशियारी महंगी पड़ गई।

















