Wednesday, February 11, 2026

पत्रकारों पर बाघेश्वर धाम सरकार ने की अशोभनीय टिप्पणी

Must Read

दुर्ग। कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा पत्रकारों को लेकर दिए गए हालिया बयान ने प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में बहस को जन्म दे दिया है। गौरतलब है कि कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा इन दिनों भिलाई के जयंती स्टेडियम में चल रही है। वही छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बीच तना-तनी चल रही है। वही आज भूपेश बघेल ने कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के विरुद्ध ढोंगी शब्द का इस्तेमाल करते हुए एक विवादित बयान दिया था।

प्रेस से बातचीत के दौरान भूपेश के ही शहर भिलाई में दर्जन भर से ज्यादा पत्रकारों को देखते ही अपनी बात को खत्म करते हुए कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने खीज में उक्त बातें कही कि “जिन पत्रकारों को खुजली हो, वो सवाल पूछें। सार्वजनिक जीवन में प्रभाव रखने वाले किसी भी व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह जिम्मेदारी और संयम के साथ अपनी बात रखे, लेकिन इस बयान ने उसी जिम्मेदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ये वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है  जे.बी.न्यूज वायरल वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं करता।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता, व्यवस्था और प्रभावशाली व्यक्तियों से सवाल पूछना और जनता तक सच पहुंचाना है। प्रेस वार्ता का मतलब ही प्रश्न और उत्तर का संवाद होता है। ऐसे में पत्रकारों द्वारा सवाल पूछना किसी पर उपकार नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त कर्तव्य का निर्वहन है। आलोचकों का कहना है कि पत्रकारों के सवालों को “खुजली” से जोड़ना न केवल पेशे का अपमान है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी चोट है। विडंबना यह है कि जब कथावाचक या अन्य सार्वजनिक व्यक्ति अपनी बात, विचार और संदेश आम जनता तक पहुंचाना चाहते हैं, तब वे इन्हीं पत्रकारों और मीडिया माध्यमों का सहारा लेते हैं। लेकिन जैसे ही सवाल असहज या चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं, तब व्यंग्यात्मक और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है। इससे यह संदेश जाता है कि सार्वजनिक मंच पर केवल प्रशंसा स्वीकार्य है, सवाल नहीं। लोकतंत्र में सवाल पूछना जवाबदेही तय करने का सबसे सशक्त माध्यम है।

चाहे वह सत्ता हो, व्यवस्था हो या फिर धार्मिक और सामाजिक प्रभाव रखने वाले व्यक्ति। आस्था के नाम पर आलोचना से बचने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है। लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति सवालों से ऊपर नहीं होता। सम्मान और श्रद्धा का अर्थ यह नहीं कि जवाबदेही से मुक्ति मिल जाए। बुद्धिजीवियों और पत्रकार संगठनों का कहना है कि सार्वजनिक मंच पर बोले गए हर शब्द का सामाजिक प्रभाव होता है। खासतौर पर ऐसे व्यक्ति के शब्द, जिनकी लाखों लोगों में गहरी आस्था है। ऐसे में भाषा की मर्यादा और संवेदनशीलता और भी जरूरी हो जाती है। यदि प्रभावशाली लोग पत्रकारों को अपमानित करेंगे, तो इससे समाज में संवाद की संस्कृति कमजोर होगी। यह मामला केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतांत्रिक संवाद से जुड़ा हुआ है। सवाल पूछना “खुजली” नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सेहत का संकेत है। सम्मान एकतरफा नहीं होता। सार्वजनिक जीवन में मौजूद हर व्यक्ति को यह समझना होगा कि आलोचना और सवाल लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। इन्हें स्वीकार करना ही एक मजबूत और परिपक्व समाज की पहचान है।

- Advertisement -
Latest News

शिवरीनारायण मेले में बड़ा हादसा, आकाश झूला टूटने से महिला समेत 6 घायल, 2 की हालत नाजुक

शिवरीनारायण। Shivrinarayan Accident: छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध शिवरीनारायण मेले में मंगलवार को आकाश झूला अचानक टूट गया। झूला टूटते ही उस पर...

More Articles Like This