कोरबा तुलसी नगर स्थित कौशिल उच्च माध्यमिक विद्यालय पर हुई कथित कार्रवाई अब केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं रही, बल्कि यह सवाल बन गई है कि क्या कोरबा में शिक्षा से अधिक प्रभाव और दबाव हावी हो रहा है? 35 वर्षों से शासन से मान्यता प्राप्त यह विद्यालय आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है और इसके केंद्र में हैं—सैकड़ों मासूम छात्र, जिनका भविष्य अधर में लटक गया है। 05 जनवरी 2026 को विद्यालय परिसर में जिन लोगों द्वारा प्रवेश कर तोड़फोड़ किए जाने का आरोप है, उनमें सौरभ अग्रवाल से जुड़े लोग और तहसील कार्यालय से संबंधित व्यक्ति बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी मान्यता प्राप्त विद्यालय में इस तरह बिना नोटिस, बिना संवाद और बिना वैकल्पिक व्यवस्था के प्रवेश करना कानूनन उचित है?यदि कोई प्रशासनिक प्रक्रिया थी, तो उसका पालन क्यों नहीं किया गया?
बोर्ड परीक्षा के समय स्कूल को अस्थिर करने की जल्दबाजी यह महज़ संयोग नहीं हो सकता कि यह पूरी कार्रवाई उस समय हुई, जब 10वीं और 12वीं के छात्र बोर्ड परीक्षाओं की निर्णायक तैयारी में हैं। छात्रों का कहना है कि कक्षाएं बाधित हो रही हैं, पढ़ाई का माहौल नष्ट हो चुका है और मानसिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।क्या किसी भी नियम से छात्रों के शैक्षणिक हित सर्वोपरि नहीं होने चाहिए?
डर का माहौल: फोन कॉल, दबाव और मैदान पर कब्जे के आरोप– खोजी पड़ताल में सामने आया है कि कुछ छात्रों के घरों में फोन कर स्कूल से नाम वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। यदि यह सही है, तो यह सीधा-सीधा मानसिक उत्पीड़न और शैक्षणिक अधिकारों का हनन है। इतना ही नहीं, जिस मैदान में वर्षों से प्रार्थना होती थी, वह अब कथित रूप से असामाजिक तत्वों की गतिविधियों का केंद्र बनता जा रहा है। सवाल उठता है—क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कार्रवाई करना है, या सुरक्षा भी सुनिश्चित करना?
प्रशासनिक चुप्पी: जवाबदेही से बचाव? सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उनसे बात नहीं हो सकी।क्या विभागीय चुप्पी किसी दबाव की ओर इशारा कर रही है? या फिर छात्रों के भविष्य को लेकर विभाग गंभीर नहीं है?
कलेक्टर को ज्ञापन, लेकिन क्या मिलेगा न्याय? विद्यालय प्रबंधन और विद्यार्थियों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर स्पष्ट मांग की है कि— परीक्षाएं पूरी होने तक विद्यालय को संचालित करने दिया जाए। असामाजिक तत्वों पर रोक लगे।विद्यालय को पुलिस संरक्षण दिया जाए।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ज्ञापन के बाद भी कार्रवाई होगी या यह फाइलों में दब जाएगा?
बड़ा सवाल: शिक्षा बनाम प्रभाव – यह मामला अब केवल कौशिल स्कूल तक सीमित नहीं है। यह कोरबा जिले की पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। यदि 35 साल पुरानी, मान्यता प्राप्त संस्था भी सुरक्षित नहीं है, तो आम स्कूलों की क्या स्थिति होगी? क्या शिक्षा मंदिर अब दबाव, कब्जा और साजिश का शिकार बनते जा रहे हैं?
अब यह देखना निर्णायक होगा कि जिला प्रशासन छात्रों के भविष्य को प्राथमिकता देता है या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा। लेकिन एक बात तय है—यदि आज आवाज नहीं उठी, तो कल किसी और स्कूल की बारी होगी।















