व्यापार संवाद कार्यक्रम के दौरान वैश्य समाज के प्रतिनिधियों की पीड़ा उस समय खुलकर सामने आई, जब उन्होंने कहा— “हमारा व्यापार खत्म होने की कगार पर है।” यह बयान केवल एक वर्ग की चिंता नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी के रूप में देखा जा रहा है।
वक्ताओं ने कहा कि जिस वैश्य समाज ने सदियों से देश की आर्थिक रीढ़ को मजबूत किया, आज वही समाज हताश और असुरक्षित महसूस कर रहा है। आरोप लगाया गया कि सरकार की नीतियों ने बड़े कॉरपोरेट और मोनोपॉली को खुली छूट दी है, जबकि छोटे और मध्यम व्यापारियों को जटिल ब्यूरोक्रेसी और त्रुटिपूर्ण जीएसटी व्यवस्था की जंजीरों में जकड़ दिया गया है।
व्यापार संवाद में यह भी कहा गया कि यह केवल नीतिगत चूक नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर उत्पादन, रोज़गार और देश के भविष्य पर पड़ रहा है। छोटे व्यापारियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि वे सरकार की कथित “सामंतवादी सोच” के खिलाफ संघर्ष करेंगे और देश के व्यापार की रीढ़ माने जाने वाले वैश्य समाज के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए पूरी ताकत से खड़े रहेंगे।
व्यापारियों ने सरकार से नीतियों की पुनर्समीक्षा, जीएसटी सरलीकरण और छोटे व्यापारियों को संरक्षण देने की मांग की है।















