जब वर्दी से पहले नजर आता है इंसान..SP सिद्धार्थ तिवारी की पुलिसिंग में दिखती है संवेदनशील की अलग तस्वीर

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अफसर बहुत होते हैं, लेकिन जनता के मन में जगह बनाने वाले कोरबा SP सिद्धार्थ तिवारी की कार्यशैली में सख्ती के साथ दिखता है भरोसे और संवेदनशील चेहरा

कोरबा। पुलिस की वर्दी का पहला अर्थ है कानून, अनुशासन और अधिकार। लेकिन इसी वर्दी के पीछे अगर संवेदनशील दिखाई देने लगे, तो पुलिसिंग सिर्फ कार्रवाई का नाम नहीं रह जाती, वह भरोसे का माध्यम बन जाती है।पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ तिवारी की कार्यशैली को लेकर बनती सकारात्मक धारणा इसी बदलाव की ओर इशारा करती है।

यह किसी व्यक्तिगत मुलाकात का संस्मरण नहीं है। न ही यह किसी अधिकारी की औपचारिक प्रशंसा भर है। बल्कि एक पत्रकार की नजर से उस पुलिसिंग को समझने की कोशिश है, जिसमें अपराध के खिलाफ सख्ती के साथ आम नागरिक को जागरूक करने, उसकी परेशानी समझने और पुलिस-जनता के बीच भरोसे की दूरी कम करने की कोशिश दिखाई देती है।

किसी अधिकारी की असली पहचान उसके सामने कही गई बातों से नहीं, बल्कि उसके पीछे आम लोग उसके बारे में क्या कहते हैं, इससे बनती है। और शायद यही किसी अफसर की सबसे बड़ी परीक्षा भी है।

कुर्सी बड़ी हो तो जिम्मेदारी भी बड़ी होनी चाहिए

आज अपराध का चेहरा भी बदल चुका है।अब जरूरी नहीं कि अपराधी सामने खड़ा दिखाई दे।कई बार वह किसी दूसरे शहर में बैठकर मोबाइल की स्क्रीन के पीछे से किसी व्यक्ति की वर्षों की कमाई पर नजर रखता है। एक लिंक, एक कॉल, एक ओटीपी या कुछ मिनट की लापरवाही और पूरा बैंक खाता खाली हो सकता है। यहीं से पुलिस की भूमिका भी बदलती है।

सिर्फ ठगी के बाद आरोपी तक पहुंचना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है कि ठगी होने से पहले नागरिक को जागरूक किया जाए।कोरबा पुलिस का साइबर जागृति अभियान इसी सोच का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंचकर नागरिकों, वित्तीय संस्थानों और आम लोगों को साइबर अपराध के नए तरीकों से सावधान करना बताता है कि पुलिसिंग अब केवल अपराध के बाद की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहती।यह प्रिवेंटिव पुलिसिंग है—अपराध होने से पहले लोगों को सावधान करना। और कई बार किसी नागरिक का ठगी से बच जाना, किसी अपराधी को पकड़ने से भी बड़ी सफलता होती है। क्योंकि वहां कोई एफआईआर नहीं होती, कोई गिरफ्तारी नहीं होती, कोई बरामदगी नहीं होती। सिर्फ एक परिवार बचता है। एक व्यक्ति की मेहनत की कमाई बचती है। और पुलिस पर उसका भरोसा बढ़ता है।

साइबर जागृति अभियान सिर्फ कार्यक्रम नहीं, सोच का बदलाव है

साइबर जागृति अभियान की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें पुलिस जनता के पास जाती है। यानी नागरिक को पुलिस कार्यालय तक आने का इंतजार नहीं किया जाता। उसे वहीं जागरूक किया जाता है, जहां वह मौजूद है। यह तरीका बताता है कि आधुनिक पुलिसिंग का मतलब सिर्फ कानून लागू करना नहीं, बल्कि समाज को कानून और अपराध की बदलती तस्वीर के प्रति जागरूक बनाना भी है। आज एक बुजुर्ग व्यक्ति से लेकर युवा तक, छोटा दुकानदार हो या नौकरीपेशा व्यक्ति हर कोई डिजिटल दुनिया से जुड़ा है। और जितनी तेजी से डिजिटल सुविधा बढ़ी है, उतनी ही तेजी से डिजिटल अपराध भी बढ़े हैं।ऐसे दौर में पुलिस की एक छोटी-सी चेतावनी किसी बड़े आर्थिक नुकसान को रोक सकती है। यही वजह है कि साइबर जागरूकता को सिर्फ अभियान नहीं, बल्कि जनसुरक्षा की नई जरूरत के रूप में देखना चाहिए।

असली लोकप्रियता पोस्टर और सोशल मीडिया से नहीं बनती

किसी अधिकारी की तस्वीर कितने पोस्टर में लगी, कितने कार्यक्रमों में उसका नाम आया या सोशल मीडिया पर कितनी पोस्ट हुईं यह लोकप्रियता का पूरा पैमाना नहीं है।

असली तस्वीर तब सामने आती है जब कोई आम आदमी बिना कैमरे के कहता है…

“हां, पुलिस ने मेरी बात सुनी थी।”

या कोई व्यक्ति यह कहता है…

“मुश्किल समय में पुलिस हमारे साथ खड़ी थी….यही वे बातें हैं जो किसी अधिकारी की छवि को सरकारी पदनाम से निकालकर लोगों की स्मृतियों में जगह देती हैं।

एक पुलिस अधिकारी की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?

पुरस्कार मिल सकते हैं। प्रशस्ति पत्र मिल सकते हैं। पद बढ़ सकता है। लेकिन इन सबके बाद भी एक सवाल बचा रहता है।

लोग आपको याद कैसे करेंगे?

क्या कोई पीड़ित व्यक्ति यह कहेगा कि मुश्किल वक्त में उसकी बात सुनी गई थी?

क्या कोई बुजुर्ग यह कहेगा कि उसे पुलिस के पास जाने में डर नहीं लगा?

क्या कोई परिवार यह कहेगा कि समय पर मिली साइबर जागरूकता के कारण वे ऑनलाइन ठगी से बच गए?

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