कोरबा।Korba Breaking: कोयले की काली परत के नीचे सिर्फ खनिज नहीं दबा है, बल्कि उन परिवारों की यादें भी दबी हैं, जिन्होंने विकास और खनन के नाम पर अपनी जमीन, घर और पुश्तैनी ठिकाने छोड़े हैं। मानिकपुर खदान के विस्तार से पहले एक बार फिर भू-विस्थापित परिवारों की पीड़ा और लंबित मुआवजे का सवाल सामने आ गया है।
पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना ने क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी, छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को पत्र सौंपकर 13 प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें सबसे अहम सवाल पुराने भू-विस्थापितों के लंबित मुआवजे और पुनर्वास का है। संगठन ने मांग की है कि नए विस्तार की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले पुराने विस्थापन से जुड़े मामलों का समाधान किया जाए।
जिन्होंने जमीन दी, क्या उन्हें अब भी इंतजार ही मिलेगा?
मानिकपुर खदान के विस्तार की चर्चा के बीच सबसे बड़ा सवाल उन परिवारों का है, जिन्होंने खनन गतिविधियों के लिए अपनी जमीन और घर छोड़े। संगठन ने पूर्व में प्रभावित परिवारों के लंबित मुआवजा, पुनर्वास और अन्य पात्र सुविधाओं का प्राथमिकता से निराकरण करने की मांग की है।
मांग सिर्फ कागज पर मुआवजे की नहीं है, बल्कि प्रभावित परिवारों का निष्पक्ष सर्वे और सत्यापन कर उन्हें नियमानुसार उनका हक दिलाने की है।
एक तरफ खदान का विस्तार होगा, दूसरी तरफ अगर किसी विस्थापित परिवार की फाइल अभी भी दफ्तरों में अटकी है, तो उसके लिए विकास का मतलब आखिर क्या है? यही सवाल अब जनसुनवाई के पहले उठ रहा है।
घर उजड़ा, जमीन गई… अब रोजगार की बारी
भू-विस्थापन के साथ सबसे बड़ी चिंता रोजी-रोटी की होती है। जिस जमीन से परिवार की पीढ़ियां चलती थीं, वह जमीन चली गई तो उसके बदले स्थायी रोजगार और आजीविका का सवाल खड़ा हो जाता है।
इसीलिए संगठन ने मानिकपुर खदान और उससे जुड़े कार्यों में स्थानीय युवाओं और खनन प्रभावित परिवारों को रोजगार में प्राथमिकता देने की मांग की है। स्थानीय लोगों को ठेका कार्यों में भी उचित अवसर देने की बात कही गई है।
मजदूरों की सुरक्षा भी सवालों के घेरे में
खदान में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा को लेकर भी मांगें उठाई गई हैं। हेलमेट, सेफ्टी शूज, दस्ताने, मास्क, सेफ्टी जैकेट सहित जरूरी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने तथा कार्यस्थल पर प्राथमिक उपचार और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
यानी सवाल सिर्फ उस जमीन का नहीं है, जो खदान के लिए ली गई, बल्कि उस जमीन पर काम करने वाले मजदूर की जिंदगी की सुरक्षा का भी है।
SCC सर्वमंगला कंस्ट्रक्शन पर मजदूरी भुगतान की शिकायत
पत्र में SCC सर्वमंगला कंस्ट्रक्शन के मजदूरों द्वारा HPC दर के अनुसार उचित भुगतान नहीं किए जाने की शिकायत का भी उल्लेख किया गया है।
संगठन ने उपस्थिति रजिस्टर, भुगतान रजिस्टर और वेतन संबंधी अभिलेखों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। साथ ही मजदूरों के साथ कथित गाली-गलौज और दुर्व्यवहार की शिकायतों की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की मांग की गई है।
CSR से सवाल: जिस इलाके से कोयला निकल रहा, वहां विकास कितना पहुंचा?
SECL के CSR फंड को लेकर भी सवाल उठाया गया है। संगठन ने खनन प्रभावित और आसपास के क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण जैसी मूलभूत सुविधाओं पर CSR राशि का नियमों के अनुसार और पारदर्शी उपयोग करने की मांग की है।
भू-विस्थापितों की पीड़ा का एक पहलू यह भी है कि जब उनकी जमीन विकास के लिए ली जाती है, तो वे उसी विकास का लाभ अपने आसपास भी देखना चाहते हैं।
कोयला ढोने वाले ट्रकों से धूल, लोगों की सांस पर असर की शिकायत
मानिकपुर खदान से कोयला परिवहन करने वाले वाहनों से सड़क पर कोयले के कण और धूल फैलने की शिकायत भी उठाई गई है।
संगठन ने कोयला परिवहन वाहनों में कोयले को पूरी तरह तिरपाल से ढकने, परिवहन मार्गों पर नियमित पानी का छिड़काव, सड़क की सफाई और धूल नियंत्रण के प्रभावी उपाय करने की मांग की है।
विस्तार से पहले पर्यावरण की ‘जांच’ जरूरी
खदान विस्तार से पहले क्षेत्र की वर्तमान वायु, जल, ध्वनि, धूल और अन्य पर्यावरणीय प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन कराने की मांग भी की गई है।
स्थानीय नागरिकों की पर्यावरण संबंधी शिकायतों का रिकॉर्ड तैयार करने और उनके समाधान के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाने की मांग की गई है।
13 मांगें, लेकिन सबसे बड़ा सवाल भू-विस्थापितों का
- पूर्व भू-विस्थापितों के लंबित मुआवजा एवं पुनर्वास मामलों का प्राथमिकता से निराकरण।
- नए खदान विस्तार से प्रभावित परिवारों के मुआवजा और पुनर्वास की स्पष्ट व्यवस्था।
- स्थानीय युवाओं एवं प्रभावित परिवारों को रोजगार में प्राथमिकता।
- मानिकपुर और आसपास पर्याप्त मेडिकल सुविधा।
- सभी मजदूरों को मेडिकल सुविधा और सुरक्षा उपकरण।
- SCC सर्वमंगला कंस्ट्रक्शन द्वारा मजदूरों के भुगतान की निष्पक्ष जांच।
- मजदूरों से कथित गाली-गलौज और दुर्व्यवहार की शिकायतों की जांच।
- SECL CSR फंड से पारदर्शी तरीके से क्षेत्र का विकास।
- कोयला परिवहन वाहनों में कोयले को पूरी तरह तिरपाल से ढकना।
- कोयला परिवहन से होने वाले धूल एवं वायु प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण।
- खदान विस्तार से पहले वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति का वैज्ञानिक आकलन।
- पर्यावरणीय मानकों के पालन की नियमित निगरानी एवं निरीक्षण।
- स्थानीय जनता की शिकायतों के निराकरण के लिए प्रभावी और पारदर्शी व्यवस्था।
जनसुनवाई में अब उठेगा सबसे बड़ा सवाल
छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के प्रदेश संयोजक दिलीप मिरी ने मांग की है कि इन सभी बिंदुओं को पर्यावरणीय जनसुनवाई की कार्यवाही में विधिवत दर्ज किया जाए और संबंधित विभाग एवं परियोजना प्रबंधन को आवश्यक कार्रवाई के लिए निर्देशित किया जाए।
मानिकपुर खदान का विस्तार विकास और उत्पादन से जुड़ा विषय हो सकता है, लेकिन उसके बीच उन परिवारों की आवाज भी सुनना जरूरी है, जिन्होंने पहले ही अपनी जमीन और घर छोड़े हैं।
क्योंकि भू-विस्थापित के लिए जमीन सिर्फ जमीन नहीं होती… वह घर होती है, पहचान होती है और पीढ़ियों की रोजी-रोटी होती है।

















