कोरबा। वर्ष 2009 के बहुचर्चित अपहरण, दुष्कर्म और धोखाधड़ी मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने तत्कालीन पुलिस उप निरीक्षक अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर को दोषमुक्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने 10 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया। वहीं, अन्य आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ राज्य सरकार की अपील भी खारिज कर दी गई।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
कोरबा सत्र न्यायालय ने 19 मार्च 2012 को अमृतलाल केरकेट्टा को IPC की धारा 376(1) के तहत 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। वहीं आशु राठौर को धारा 420 के तहत 1 वर्ष तथा धारा 376(1)/109 के तहत 7 वर्ष के कारावास से दंडित किया गया था।
नौकरी का झांसा देकर ले जाने का आरोप
अभियोजन के अनुसार, पीड़िता को नौकरी दिलाने का भरोसा देकर आशु राठौर ने उसका ATM कार्ड और जेवर लिए थे। इसके बाद उसे बिलासपुर ले जाया गया, जहां अमृतलाल केरकेट्टा पर जबरन यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया गया था। अभियोजन ने पीड़िता को कोरबा, सक्ती और रायगढ़ ले जाने तथा धमकाकर रखने के भी आरोप लगाए थे।
पीड़िता की गवाही में विरोधाभास
हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान का विस्तार से परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पीड़िता ने शुरुआत में अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर के पक्ष में शपथपत्र और बयान दिया था। उसमें उसने माता-पिता से परेशान होकर नौकरी की तलाश में बिलासपुर जाने की बात कही थी। बाद में माता-पिता और रिश्तेदारों के थाने पहुंचने के बाद उसने आरोपियों के खिलाफ बयान दिया।
अदालत ने यह भी गौर किया कि पीड़िता कई स्थानों पर आरोपियों के साथ गई और उसे कई अवसरों पर संपर्क करने का मौका मिला, लेकिन उसने तत्काल किसी से शिकायत नहीं की। उसने आशु राठौर से फोन पर बातचीत की, लेकिन अपने माता-पिता से संपर्क नहीं किया।
ATM कार्ड और मेडिकल साक्ष्य भी बने अहम
हाईकोर्ट ने ATM कार्ड की बरामदगी को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि ATM कार्ड पीड़िता के पिता से जब्त किया गया था, न कि पीड़िता से।
इसके अलावा पुलिस रिकॉर्ड में पीड़िता के घर से जाने की तारीख को लेकर भी विरोधाभास पाया गया। मेडिकल परीक्षण में डॉक्टर को शरीर पर बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली। अदालत ने इन परिस्थितियों को पीड़िता की गवाही में मौजूद अन्य विरोधाभासों के साथ समग्र रूप से देखा।
सुप्रीम कोर्ट के न्याय दृष्टांतों का उल्लेख
हाईकोर्ट ने Santosh Prasad और Vipin @ Lalla मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है, लेकिन ऐसी गवाही न्यायालय का पूर्ण विश्वास अर्जित करने वाली होनी चाहिए।
संदेह से परे आरोप साबित नहीं हुए
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मामले में पीड़िता की गवाही तथा उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य अभियोजन की कहानी को उचित संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके चलते अदालत ने अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर की दोषसिद्धि एवं सजा निरस्त करते हुए उन्हें दोषमुक्त कर दिया।
वहीं, अन्य आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ राज्य की अपील भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। दोषमुक्त किए जाने के बाद अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर ने इसे “सत्य की जीत” बताते हुए राहत व्यक्त की है।















