परिवार से दूर हुए बुजुर्गों के लिए उम्मीद बना प्रशांति वृद्धाश्रम, कोरबा में सम्मान के साथ कट रही जिंदगी की सांझ

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कोरबा का प्रशांति वृद्धाश्रम उन बुजुर्गों के लिए सहारे की जगह बना हुआ है, जिनसे जिंदगी के किसी मोड़ पर परिवार और अपनों का साथ छूट गया। उम्र के इस पड़ाव पर जहां व्यक्ति को सबसे ज्यादा अपनापन और देखभाल की जरूरत होती है, वहीं कई वरिष्ठ नागरिक अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करते हैं। ऐसे लोगों को प्रशांति वृद्धाश्रम में रहने के साथ भोजन, इलाज और रोजमर्रा की जरूरतों की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। फिलहाल यहां 28 महिला और पुरुष वरिष्ठ नागरिक रह रहे हैं।

प्रशांति वृद्धाश्रम की कहानी करीब दो दशक से ज्यादा पुरानी है। इसकी शुरुआत प्रशासन की पहल से हुई और समय के साथ अलग-अलग संस्थाओं ने इसके संचालन की जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में नवदृष्टि समाजसेवी संस्था वर्ष 2005 से इसका संचालन कर रही है। संस्था के मुताबिक वृद्धाश्रम के लिए किसी सरकारी या गैर सरकारी अनुदान पर निर्भरता नहीं है और अपने संसाधनों तथा समय-समय पर मिलने वाले जनसहयोग से व्यवस्थाएं संचालित की जाती हैं।

23 साल पहले रखी गई थी नींव

प्रशांति वृद्धाश्रम के निर्माण की पहल कोरबा के तत्कालीन कलेक्टर पीसी दलेई के कार्यकाल में हुई थी। नगर पालिक निगम की ओर से भवन तैयार कराया गया और 19 सितंबर 1998 को तत्कालीन जांजगीर लोकसभा सांसद चरणदास महंत ने इसका लोकार्पण किया। इसके बाद 23 अप्रैल 2003 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी की मौजूदगी में आयोजित कार्यक्रम के साथ वृद्धाश्रम का नियमित संचालन शुरू हुआ। इसके लिए तत्कालीन कलेक्टर इशिता राय के प्रयासों को भी महत्वपूर्ण बताया जाता है।

रोटरी क्लब से नवदृष्टि तक पहुंची जिम्मेदारी

शुरुआती दौर में प्रशांति वृद्धाश्रम के संचालन की जिम्मेदारी रोटरी क्लब को दी गई थी। करीब दो वर्ष तक संचालन के बाद इसे जिला प्रशासन को सौंप दिया गया। इसके बाद 1 जुलाई 2005 को तत्कालीन कलेक्टर गौरव द्विवेदी ने नवदृष्टि समाजसेवी संस्था को इसकी जिम्मेदारी दी। तब से संस्था लगातार वृद्धाश्रम का संचालन कर रही है।

28 बुजुर्गों के लिए बना परिवार जैसा सहारा

वर्तमान में प्रशांति वृद्धाश्रम में 28 वरिष्ठ नागरिक रह रहे हैं। यहां महिला और पुरुष दोनों के लिए रहने की व्यवस्था है। बुजुर्गों को भोजन, चिकित्सा और जरूरत की दूसरी सुविधाएं निःशुल्क दी जाती हैं। यहां रहने वाले हर बुजुर्ग की अपनी अलग कहानी है। किसी ने परिवार खोया, किसी का अपनों से साथ छूटा तो किसी को परिस्थितियों के कारण घर से दूर होना पड़ा। वृद्धाश्रम उनके लिए ऐसी जगह बन गया है, जहां उन्हें कम से कम जीवन के इस दौर में अकेलेपन से बाहर आने का अवसर मिलता है।

जनसहयोग से चल रही व्यवस्थाएं

नवदृष्टि समाजसेवी संस्था के अनुसार वृद्धाश्रम के संचालन के लिए किसी सरकारी या गैर सरकारी अनुदान का इस्तेमाल नहीं किया जाता। संस्था अपने स्रोतों और लोगों से मिलने वाले सहयोग के जरिए भोजन, चिकित्सा और दैनिक जरूरतों की व्यवस्था करती है। लंबे समय से इस तरह की व्यवस्था को जारी रखना संस्था के लिए लगातार सेवा और संसाधनों की जरूरत वाला काम है।

वृद्धजन दिवस पर सम्मान और अपनापन देने का संदेश

1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के मौके पर प्रशांति वृद्धाश्रम की कहानी बुजुर्गों की देखभाल और सम्मान की जरूरत को सामने लाती है। वरिष्ठ नागरिकों के पास जीवन का लंबा अनुभव और समाज की कई पीढ़ियों की यादें होती हैं। ऐसे में उनका सम्मान केवल एक दिन तक सीमित न रहकर रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बने, यही इस अवसर का व्यापक संदेश है। प्रशांति वृद्धाश्रम की 23 साल से अधिक की यात्रा इसी सोच के साथ बुजुर्गों को सुरक्षित माहौल और अपनापन देने की कोशिश की कहानी है।

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